अजय चहल 'मुसाफ़िर'

रविवार, 3 जुलाई 2016

लेखनी


आंख का देखा और कान का सुना;
अनबोले वो शब्द, जिन्हें मन ही मन गुना;
धीमे-धीमे जो दिल पर असर करते गए,
उन्हें कलम के सहारे, 'लेखनी' में बुना ||
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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

"कुछ विचार, जिन्हें कम शब्दों में कहा जा सका है |"

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