अजय चहल 'मुसाफ़िर'

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

गुनाह

बन्दे को है, हर सजा कबूल,
गर कोई उसका गुनाह बता दे।
सजदा तो फिर लाजिमी है,
गर कोई खुद को खुदा बता दे।।
~
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
पंचकूला, हरियाणा।

मंगलवार, 31 मार्च 2026

शख्स

आज फिर शीशे के सामने एक अजीब शख्स था, 
जिस्म था मेरा, पर उसके चेहरे पे तेरा अक्श था।
~
मुसाफ़िर
*अक्श: हूबहू तस्वीर/Reflection

बुधवार, 25 मार्च 2026

चुप

हर पल, आँखों के सामने रहता है, 
ना चुप है और ना कुछ कहता है।
~
मुसाफ़िर

मंगलवार, 6 जून 2023

चित्रकार

ये कौन चित्रकार है,
जो बैठा बादलों के पार है।
श्वेत, श्याम ही नहीं, ये हर रंग का कलाकार है,
जब मैं सिर्फ मैं तक सिमटा रहा,
वो चुप रहा, जवाब उसका ये संसार है।
ये कौन चित्रकार है?

शुक्रवार, 12 मई 2023

प्यार

हवा में जो ये खुशबू है, 
फूलों पे जो ये बहार है।

लोग कहते हैं, कुदरत है,
मैं कहता हूं, ये प्यार है।
~
मुसाफ़िर

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

चाहत

गर चाहत कहे, 
चाहत को, 
चाहत से,
"फासला रखो",
और 
चाहत मान ले, 
चाहत से,
तो मानो, 
कि चाहत है।
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लेखनी:
अजय चहल मुसाफ़िर
जींद, हरियाणा

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बेगाना

है घर से बेघर और दिलों से बेगाना,
मुस्कानें हैं नई, पर है दर्दों से रिश्ता पुराना,
स्याह पन्नों की किताब से, 
है मुश्किल बड़ा कोई किस्सा सुनाना,
जिसे लूटा है अपनों ने, उसे क्या ठगेगा जमाना।

लबों तक भरा है, कहने को बस ढूंढे इक बहाना,
भले हो सुनने की नीयत, पर डराता है तेरा पास आना,
क्या जाने की जल्दी है मुसाफ़िर?
शुरू कर दिया है जो अपनापन जताना,
जिसे लूटा हो अपनों ने, उसे क्या ठगेगा जमाना।।
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लेखनी:
अजय चहल मुसाफ़िर
जींद, हरियाणा




शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

गुरुर

ऐ चिराग, 
ये गुरुर, जो तेरे हिस्से में आया है,
भरम में जिसके, तूने अपना सीना जलाया है,
कदमों को मिले रफ़्तार, तो होने का मतलब है,
भटका जो मुसाफ़िर, तो तेरी ये रौशनी जाया है।

दर, दीवार और चौखट बंधन नहीं, तेरी आड़ हैं,
इन पर्दों को जलाकर, तूने आफतों को बुलाया है,
गर वो ना रहा, तो बस इस बाती तक है वजूद तेरा,
याद रख, 
तेरे भरोसे उसका कद नहीं, बस उसका साया है।।
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लेखनी: अजय चहल मुसाफ़िर



सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

मलाल

खुद ही से सवाल वो करता रहा,
खुद ही के जवाब से डरता रहा।

जो बात थी ही नहीं, मेरे जहन में,
कमबख्त उसी का मलाल करता रहा।

बस वक़्त के ही फासले थे, दिलों के दरमियान,
पल भर की खुशी खातिर, वो बरसों मरता रहा।
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत



शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

ख़ास

अब तुम दूर रहो, या रहो तुम पास,
दिल में हो बसे, रहोगे हमेशा ख़ास

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लेखनी:
अजय चहल मुसाफिर
चेन्नई, भारत

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

दर्द

दर्द को बस, वही कहे,
जिसने हैं, वो दर्द सहे।

जिसने जिया, वही जाने,
आँसू कैसे, स्याही बन बहे।

{सिर्फ सहने वाला ही जानता है, उस पे क्या गुजरी है। और सिर्फ कहने वाले, अक्सर हमदर्द नहीं, बेदर्द हैं।}
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

गुरुवार, 21 मार्च 2019

उदाहरण

अपनी ही जिंदगी कुछ ऐसे जी जाए,
कि औलाद को जब समझ दी जाए,

नाम किसी और का तब लेना ना पड़े,
उदाहरण किसी और का देना ना पड़े।
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आभार: Dr. S. S. Mor
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

शनिवार, 2 मार्च 2019

होंसले

दर्द एक से हैं सारे,
बस होंसले हैं न्यारे-न्यारे;

कोई हताश हो बिखर गया,
कोई संघर्ष कर निखर गया।
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अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

सोमवार, 6 अगस्त 2018

यार

घर जैसे बना होता है दीवारों से,
यूँ ही कतरा कतरा,
हम भी बने हैं, हमारे यारों से।

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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफिर'
भारत


शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

मंज़िल

चाहत की मंज़िल के रस्ते, कभी-कभी होते हैं अनचाहे,
सफ़र हैं फिर भी ज़ारी रहते, मुसाफ़िर चाहे या ना चाहे।

अनमने ही सही, सब्र से हसरतें, हम इतनी दूर तक ले आये,
कि दो-चार कदम ही करें फैसला, मंज़िल पाये या ना पाये।।

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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफिर'
भारत







*With few inputs from Srishilan.

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

बेकरारी

तेरे दर की बेकरारी में, ये दिल,
गूँजते अरमानों को, दबी ज़ुबाँ में कहे।

पी कर ज़माने भर के, हौंसलों का सैलाब,
दहशतें ज़िगर की, मेरे आंसुओं में बहे।

अब मंज़िलों की आस में, धुँधला रहे चिराग,
बता चाँद ! तेरी ख़ातिर,
कब तक मुसाफ़िर, इन सितारों को सहे।।
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Dedicated to Thee !!
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लेखनी :
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
मद्रास, भारत

Pic credits: Flickr


बुधवार, 6 सितंबर 2017

मुस्कान

शान मेरी देखने वालो,
मुस्कान मेरी देखने वालो,
गर पूछो, मेरे अंदर है, क्या चल रहा ?
तो पूछो ज़रा, उस रौशन सितारे से,
क्यों अंदर से है, वो जल रहा ?

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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

PC: space.com

सोमवार, 4 सितंबर 2017

अहसान

शायद दिल खफ़ा था उसका,
ज़माने से गीली, मेरी आँखों में जमा, नमक देख कर,
अहसान कर गया, वो कह के, "ना निकलेंगे अब तेरे आँसूं",
जब गुज़रा बगल से, मेरे चेहरे पर, एसिड फेंक कर ।।

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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत
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A Tamil Movie referred by C. Srishilan:
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There are so many victims like Sonali

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जुस्तजू

जुस्तजू कुछ ऐसी, तेरी रही,
कि हरदम दांव पे लगाया, तुझ ही को ।

तलाश जो शायद मुझे, मेरी रही,
वो तो खो कर मिली, मुझ ही को ।।
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जुस्तजू = तलाश, Quest
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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
अमृतपुरी, कोल्लम, केरल, भारत


शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

ज़िन्दा रस्ते

माना उखड़ी साँसों के बूते, वो हरफ़नमौला,
अपनी हर मंजिल को पाश लेते हैं ।

पर अपनी धुन के मस्त मुसाफ़िर तो,
बस ज़िन्दा रस्ते का एहसास लेते हैं ।।


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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत




मंज़र

जब-जब नहीं दुखा होगा मेरा दिल,
किसी और का दिल दुखाते हुए ।

मंज़र रहा होगा निगाह में, हनुमान का,
आग लगी पूँछ से, लंका जलाते हुए ।।


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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत


शनिवार, 11 मार्च 2017

वोट की चोट

जिसे भी हुई है, वोट की चोट,
वो फटी जेबों में, ढूंढें अपने खोट,
शायद प्रगति-पथ, देश रहा है लौट !!

भारत माता की जय !!
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मुसाफ़िर


 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
It is time for certain Indian politicians to enhance their voter literacy. Today's results say it all. The common man knows well, how to 'Modi-fy future of India'.
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Context: 11 March 2017, Election results came out for four Indian states.

मंगलवार, 7 मार्च 2017

रूबरू

कविता में सुर और इन्सान में गुर,
रूबरू होने पर, मिल ही जायेंगे ।
उनकी बेचैन नज़रों को, पढ़ा कर मुसाफ़िर,
तार तेरे भी दिल के, हिल ही जायेंगें ।।
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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत
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"Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings. It takes its origin from emotions recollected in tranquility" - William Wordsworth

Pic credits: Pooja Chahal

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बलिदान

'बलिदान' - 'बलि' और 'दान' का मेल है।
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'बलिदान' शब्द का रहा हमेशा स्वर्णिम इतिहास है,
ये है, हर उस पल का हिस्सा, जो ख़ास है,
शूरवीरों का है गहना और आम-जन की आस है।।

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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफिर'
चेन्नई, भारत
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 (शहीदी दिवस - 2017)



सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

ख़ूबी

ख़ूबी तो उस नज़र में थी,
जिसने हमें देख लिया, हमसे भी बेहतर।
वर्ना हम तो ख़ाकसार हैं, पहले रोज़ से।


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लेखनी: 
'मुसाफ़िर'
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शायद, इस बार वो नज़र कैमरे की थी ....
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Beauty lies..
in beholder's eyes..

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Picture Credits: Anil K Mathew

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

प्रकाश-पर्व

प्रकाश-पर्व, दीपावली की आपको एवम् आपके प्रियजनों को शुभकामनाएँ !!
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दीप जलाएँ, पकवान खिलाएँ,
मुस्कान बाटें और खुशियाँ मनाएँ ।

जनाब, रीस अच्छी बातों की होनी चाहिए,
तोहफ़ा दें अगली पीढ़ी को और अपनी भी साँसें बचाएँ,
क्यों किसी से होड़ कर, हम यूँ प्रदुषण फैलाएँ । 
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लेखनी: 
अजय चहल 'मुसाफ़िर',
चेन्नई, भारत
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P.S.-
जिन्हें धमाकों का शौक है, उनकी LoC पर जरुरत है
जल्दी पहुंचें, ताकि कोई फौजी भी अपने परिवार संग दिवाली मना सके
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Happy Deepavali !!
Lighten up in and out !!
'Intimacy' by Surekha Pillai

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

नारी

तुम जो, मेरे जिस्म ही नहीं,
रूह को भी बांधने की कर रहे तैयारी,
जरा याद रखना,
नारी से है नर, ना कभी नर से नारी ।।

अबला कहते हो तुम मुझे,
पर मैंने तो टाली है, हर बला तुम्हारी,
ना भूलो तुम,
नारी से है नर, ना कभी नर से नारी ।।

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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
7 अक्टूबर 2016
चेन्नई, भारत



रविवार, 11 सितंबर 2016

गम

माना, कि आँखें मेरी नम नहीं हैं,
पर कैसे कहूँ,
कि दिल में कोई गम नहीं है ।।

दुनिया की नज़रों में तो, बहुत मुस्कुराता हूँ मैं;
पर कुछ नज़रें हैं, जो पढ़ लेती हैं मेरा चेहरा,
बस उन्हीं नज़रों से नज़र बचाता हूँ मैं ।।

आज-कल, जब भी पूछता है कोई, हाल-चाल,
बस, 'ठीक-ठाक' ही सुनना चाहता है;
क्योंकि वक़्त नहीं है, पूछने को दूसरा सवाल ।।

देख, आँखें तेरी भी नम नहीं हैं,
शिद्दत और फुर्सत से गर किसी ने पुछा ही नहीं;
तो कैसे कहे 'मुसाफ़िर', कि दिल में गम नहीं हैं ।।
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Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/gam
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
11 सितम्बर 2016,
चेन्नई, भारत



सोमवार, 8 अगस्त 2016

अक्सर

कई बार, सच ना बोलने वाले ही, झूठे नहीं होते,
अक्सर, कुछ ना बोलने वाले भी, सच्चे नहीं होते।

मौन भी मुखर होता है, पर नीयत के हिसाब से,
अक्लमंद देखा है मैंने, जाने कितने अनपढ़ों को,
अक्सर, मूर्खों की फेहरिस्त में मिले, कुछ पढ़े हुए किताब से ।।

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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत


रविवार, 7 अगस्त 2016

यादें


चंद तस्वीरें दीवारों पे सजती हैं,
बाकी सब तो मेरे दिल में बस्ती हैं,
जाने कितने हम-दौर गुजरे, इस दिल से,
तब समझा कमबख्त, यादें कहाँ इतनी सस्ती हैं ||


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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'


दोस्त


By the natural principle of adaption, every friend became a part of me, and thus a bit of YOU is always with ME, growing / maturing / nurturing within ME.
Thanks for sharing YOU with ME.

ढूंढने पे मिल ही जाता है, हर दोस्त मेरा, मेरे अन्दर;
तेरे हिस्से की बूंद-बूंद से ऐ दोस्त, देख बन रहा हूँ समन्दर !!
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'


#दोस्ती #FriendshipDay #ThankYou #शुक्रिया


रविवार, 3 जुलाई 2016

लेखनी


आंख का देखा और कान का सुना;
अनबोले वो शब्द, जिन्हें मन ही मन गुना;
धीमे-धीमे जो दिल पर असर करते गए,
उन्हें कलम के सहारे, 'लेखनी' में बुना ||
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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

"कुछ विचार, जिन्हें कम शब्दों में कहा जा सका है |"

गुरुवार, 30 जून 2016

फिक्र


जब से हुस्न जिक्र में है, इश्क भी फिक्र में है;
कहीं नादानी ना कर बैठे फिर;
असर हो भी जाता उनकी उम्मीदों का,
पर गुजरी राह के काँटों से, शायद संभल गया है 'मुसाफ़िर' ||

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लेखनी- अजय चहल 'मुसाफ़िर'
30 जून,  2016
चेन्नई

सोमवार, 16 नवंबर 2015

Happy Diwali - Haryanvi


गाबरू लागरे बजाण बम,
अर बालकां की फूलझड़ी करें चम-चम्,
चबारयां पै लागरी ज्यूंकर दीवां की लैन,
रेढू बूगी भर भर आवै थारे, ख़ुशी, अमन, अर चैन ।।

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मखां दीवाली की राम राम, अर माहरे टाबर की ओड़ ते बधाई !!

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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

गुज़ारिश


जितने भी अरमान, आपके दिल में पल रहे होंगे ;
वो रोशनी और तपिश ले , पहुंचे हर जहन में,
गुज़ारिश मेरी उन दीयों से, जो आज कि रात जल रहे होंगे।।

"दीवाली मुबारक़ "

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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

रविवार, 9 जून 2013

ये दुरी, बहुत बुरी


खुलें जब भी मेरी आँखें,
लगे तू मेरे आस-पास;
बंद इन्हें जो करूं,
तो रहे न फासला भी पास ||
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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शुक्रवार, 31 मई 2013

तिरंगा


क्या क्या देखना बाकी है, 
इस कुर्सी के खेल में; 
तिरंगा  फेहरा रहें हैं लाल किले पे,
होना चाहिए जिनको तिहार जेल में ||

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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शर्म करो, डूब मरो


 काबिल समझ तुम्हे कमान सोंपी थी,
निकला रोबोट , जिसे समझ रहे थे इन्सान ;
भूखे पेट और प्यासे कंठ ने किया जीना हराम ;
और तुम "दो बूँद जिन्दगी की" पिला कर;
कहते हो, "हो रहा भारत निर्माण" .......

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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'