अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

नारी

तुम जो, मेरे जिस्म ही नहीं,
रूह को भी बांधने की कर रहे तैयारी,
जरा याद रखना,
नारी से है नर, ना कभी नर से नारी ।।

अबला कहते हो तुम मुझे,
पर मैंने तो टाली है, हर बला तुम्हारी,
ना भूलो तुम,
नारी से है नर, ना कभी नर से नारी ।।

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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
7 अक्टूबर 2016
चेन्नई, भारत



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