अजय चहल 'मुसाफ़िर'

रविवार, 11 सितंबर 2016

गम

माना, कि आँखें मेरी नम नहीं हैं,
पर कैसे कहूँ,
कि दिल में कोई गम नहीं है ।।

दुनिया की नज़रों में तो, बहुत मुस्कुराता हूँ मैं;
पर कुछ नज़रें हैं, जो पढ़ लेती हैं मेरा चेहरा,
बस उन्हीं नज़रों से नज़र बचाता हूँ मैं ।।

आज-कल, जब भी पूछता है कोई, हाल-चाल,
बस, 'ठीक-ठाक' ही सुनना चाहता है;
क्योंकि वक़्त नहीं है, पूछने को दूसरा सवाल ।।

देख, आँखें तेरी भी नम नहीं हैं,
शिद्दत और फुर्सत से गर किसी ने पुछा ही नहीं;
तो कैसे कहे 'मुसाफ़िर', कि दिल में गम नहीं हैं ।।
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Listen it here:
https://soundcloud.com/ajay-chahal/gam
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
11 सितम्बर 2016,
चेन्नई, भारत



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