तेरे दर की बेकरारी में, ये दिल,
गूँजते अरमानों को, दबी ज़ुबाँ में कहे।
पी कर ज़माने भर के, हौंसलों का सैलाब,
दहशतें ज़िगर की, मेरे आंसुओं में बहे।
अब मंज़िलों की आस में, धुँधला रहे चिराग,
बता चाँद ! तेरी ख़ातिर,
कब तक मुसाफ़िर, इन सितारों को सहे।।
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Dedicated to Thee !!
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लेखनी :
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
मद्रास, भारत
गूँजते अरमानों को, दबी ज़ुबाँ में कहे।
पी कर ज़माने भर के, हौंसलों का सैलाब,
दहशतें ज़िगर की, मेरे आंसुओं में बहे।
अब मंज़िलों की आस में, धुँधला रहे चिराग,
बता चाँद ! तेरी ख़ातिर,
कब तक मुसाफ़िर, इन सितारों को सहे।।
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Dedicated to Thee !!
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लेखनी :
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
मद्रास, भारत
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| Pic credits: Flickr |

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