अजय चहल 'मुसाफ़िर'

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जुस्तजू

जुस्तजू कुछ ऐसी, तेरी रही,
कि हरदम दांव पे लगाया, तुझ ही को ।

तलाश जो शायद मुझे, मेरी रही,
वो तो खो कर मिली, मुझ ही को ।।
----------
जुस्तजू = तलाश, Quest
----------
लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
अमृतपुरी, कोल्लम, केरल, भारत


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for taking time to write here.