अजय चहल 'मुसाफ़िर'

रविवार, 7 अगस्त 2016

यादें


चंद तस्वीरें दीवारों पे सजती हैं,
बाकी सब तो मेरे दिल में बस्ती हैं,
जाने कितने हम-दौर गुजरे, इस दिल से,
तब समझा कमबख्त, यादें कहाँ इतनी सस्ती हैं ||


-----
लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for taking time to write here.