अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

मंज़र

जब-जब नहीं दुखा होगा मेरा दिल,
किसी और का दिल दुखाते हुए ।

मंज़र रहा होगा निगाह में, हनुमान का,
आग लगी पूँछ से, लंका जलाते हुए ।।


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लेखनी:
अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत


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