अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बेगाना

है घर से बेघर और दिलों से बेगाना,
मुस्कानें हैं नई, पर है दर्दों से रिश्ता पुराना,
स्याह पन्नों की किताब से, 
है मुश्किल बड़ा कोई किस्सा सुनाना,
जिसे लूटा है अपनों ने, उसे क्या ठगेगा जमाना।

लबों तक भरा है, कहने को बस ढूंढे इक बहाना,
भले हो सुनने की नीयत, पर डराता है तेरा पास आना,
क्या जाने की जल्दी है मुसाफ़िर?
शुरू कर दिया है जो अपनापन जताना,
जिसे लूटा हो अपनों ने, उसे क्या ठगेगा जमाना।।
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लेखनी:
अजय चहल मुसाफ़िर
जींद, हरियाणा




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