अजय चहल 'मुसाफ़िर'

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

गुरुर

ऐ चिराग, 
ये गुरुर, जो तेरे हिस्से में आया है,
भरम में जिसके, तूने अपना सीना जलाया है,
कदमों को मिले रफ़्तार, तो होने का मतलब है,
भटका जो मुसाफ़िर, तो तेरी ये रौशनी जाया है।

दर, दीवार और चौखट बंधन नहीं, तेरी आड़ हैं,
इन पर्दों को जलाकर, तूने आफतों को बुलाया है,
गर वो ना रहा, तो बस इस बाती तक है वजूद तेरा,
याद रख, 
तेरे भरोसे उसका कद नहीं, बस उसका साया है।।
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लेखनी: अजय चहल मुसाफ़िर



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