आंख का देखा और कान का सुना; अनबोले वो शब्द, जिन्हें मन ही मन गुना; धीमे-धीमे दिल पर जो असर करते गए, उन्हें कलम के सहारे, 'लेखनी' में बुना ||
दर्द एक से हैं सारे, बस होंसले हैं न्यारे-न्यारे;
कोई हताश हो बिखर गया, कोई संघर्ष कर निखर गया। ---- अजय चहल 'मुसाफ़िर' चेन्नई, भारत
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