आंख का देखा और कान का सुना; अनबोले वो शब्द, जिन्हें मन ही मन गुना; धीमे-धीमे दिल पर जो असर करते गए, उन्हें कलम के सहारे, 'लेखनी' में बुना ||
अपनी ही जिंदगी कुछ ऐसे जी जाए, कि औलाद को जब समझ दी जाए,
नाम किसी और का तब लेना ना पड़े, उदाहरण किसी और का देना ना पड़े। -------------- आभार: Dr. S. S. Mor --------------- लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर' चेन्नई, भारत
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