अजय चहल 'मुसाफ़िर'

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

दर्द

दर्द को बस, वही कहे,
जिसने हैं, वो दर्द सहे।

जिसने जिया, वही जाने,
आँसू कैसे, स्याही बन बहे।

{सिर्फ सहने वाला ही जानता है, उस पे क्या गुजरी है। और सिर्फ कहने वाले, अक्सर हमदर्द नहीं, बेदर्द हैं।}
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लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर'
चेन्नई, भारत

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