आंख का देखा और कान का सुना; अनबोले वो शब्द, जिन्हें मन ही मन गुना; धीमे-धीमे दिल पर जो असर करते गए, उन्हें कलम के सहारे, 'लेखनी' में बुना ||
दर्द को बस, वही कहे, जिसने हैं, वो दर्द सहे।
जिसने जिया, वही जाने, आँसू कैसे, स्याही बन बहे।
{सिर्फ सहने वाला ही जानता है, उस पे क्या गुजरी है। और सिर्फ कहने वाले, अक्सर हमदर्द नहीं, बेदर्द हैं।} ------- लेखनी: अजय चहल 'मुसाफ़िर' चेन्नई, भारत
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