अजय चहल 'मुसाफ़िर'

रविवार, 9 जून 2013

ये दुरी, बहुत बुरी


खुलें जब भी मेरी आँखें,
लगे तू मेरे आस-पास;
बंद इन्हें जो करूं,
तो रहे न फासला भी पास ||
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लेखनी : अजय चहल 'मुसाफ़िर'

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